हिंदी दिवस

आज हिंदी दिवस है ,वाह बहुत ही अद्भुत क्षण हैं ,इस कालजयी भाषा के वृतांत का , आज अपनी ही लिखी एक कविता आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ , व्याकरण की त्रुटियां हो सकती हैं उम्मीद हैं आप उन्हें अनदेखा कर मर्म को समझ सकेंगे !! संयोग से आज हमारे घर की ज्येषठ पुत्री और मेरी भतीजी जाह्नवी का जन्मदिवस 🎂भी हैं !! ऐसे में सुखद अनुभूति होना स्वाभाविक है !!
खैर आजकल भाषाई छेत्रवाद की वजह से पानी के ऊपर जो संग्राम मचा हैं , शायद उसमे भी हिंदी का प्रचार प्रसार एक विकल्प हो सकता हैं !! विषय पे वापस लौटते है, ये कृति पहले की हैं, अच्छी लगे तो आपकी विशेष टिपण्णी चाहूंगा 👇👇👇
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क्रंदन उस भाषा की जो कभी बनके चन्दन महकती थी
आज हाशिये पे आके किसी कोने में सिसकती है
यह सोच कोई तो तारणहार हो,जो एक नए वाद में ले चल पड़े
अपितु हम निर्विवाद ही विदेशी और मातृभाषा के अन्तर्द्वन्द में उलझे पड़े
विडम्बना ऐसी राष्ट्रभाषा के सम्मान की ,मुखौटे पहन बैठे हैं झंडाबरदार
करुणा,वीरता ,हास्य रास का इसमें है अद्भुत श्रृंगार

लाडली रही है वो पन्त ,दिनकर और निराला जैसे अशंख्य शशक्त हस्ताक्षरों की
स्वतंत्रता संग्राम में जिसने क्रांति की लपटे जलाई ,
आज वही अपनी स्वतंत्र भूमि पर अस्तित्व की लड़ाइयां लड़ रही !!
हर राज्य की अपनी भाषा हो गई जो कुछ सभ्य लोग बचे उनकी अंग्रेजी हो गई,
मझधार में वह व्यथित रही, किन्तु किंचित भी आभा ना गई,
कुंठित है तेज आज हमारी स्नेह की बिंदी की
विश्वास है की स्वर्णिम लड़िया पिरोयी जाएँगी फिर से कालजयी भाषा हिंदी की !!

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